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मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

बदी न कर बैठें !

ख़ुदी  को  भूल  के   हम  ख़ुदकुशी  न  कर  बैठें
ग़मों  से  टूट  के    ये:   बुजदिली    न  कर  बैठें

ख़ुदा   बचाए     जा   रहे   हैं  वो:   सियासत  में
रवायतों   के   मुताबिक़     बदी     न  कर  बैठें

नज़र  नज़र  में  कर  लिया  किसी  से  अह्दे-वफ़ा
हंसी  हंसी  में     वो:    दीवानगी     न  कर  बैठें

उठाए       ख़ूब       मफ़ायद       चुकाएंगे  कैसे
दबाव  में    वो:   ग़लत  को   सही  न  कर  बैठें

ख़ुदा  पे    हमको     यक़ीं  है    कभी   न  हारेंगे
मगर    जूनून    में    बादाकशी     न  कर  बैठें

की    एक  बार    जो  तौबा    हज़ार  बार  करी
कहीं  ख़ुदा  से  भी  हम  दिल्लगी  न  कर  बैठें !

                                                                  ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: ख़ुदी: अस्मिता, स्वाभिमान; ख़ुदकुशी: आत्म-घात; बुजदिली: कायरता; सियासत: राजनीति; रवायतों: परम्पराओं; 
मुताबिक़: अनुसार; बदी: अ-कर्म, बुरा काम; अह्दे-वफ़ा: निर्वाह का संकल्प; दीवानगी: पागलपन, मूर्खता;मफ़ायद: फ़ायदा का बहुवचन, लाभ; जूनून: उन्माद; बादाकशी: मद्यपान;  दिल्लगी: परिहास। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह रचना आज बुधवार (23-10-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 154 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    एक नजर मेरे अंगना में ...
    ''गुज़ारिश''
    सादर
    सरिता भाटिया

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  2. बेहद खुबसूरत ग़ज़ल, बहुत ही बढ़िया!

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