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रविवार, 4 फ़रवरी 2018

सोचते नहीं बाग़ी ...

आजकल  ज़माने  में    ऐतबार  किसका  है
बेवफ़ा  हवाओं  पर  इख़्तियार  किसका  है

क्यूं  बताएं  दुनिया  को  राज़  गुनगुनाने  का
लोग  जान  ही  लेंगे  ये;  ख़ुमार  किसका  है

इश्क़  ही  तरीक़ा  है  रंजो-ग़म   भुलाने  का
सामने  खड़े  हैं  हम     इंतज़ार  किसका  है

शुक्रिया  हमें  अपनी   बज़्म  में  बिठाने  का
आपने  दिया  है  जो  वो:  मयार  किसका  है

वक़्त  तोड़  डालेगा  हर  तिलिस्म  साहिर  का
ये:  हसीन  लम्हा  भी    राज़दार  किसका  है

इंक़िलाब  के  आशिक़    मौत  से  नहीं  डरते
सोचते  नहीं  बाग़ी       इक़्तिदार  किसका  है

ख़ाक  में  पड़े  हैं  सब  शाह  भी  भिखारी  भी
कौन  जानता  है  अब  ये;  मज़ार  किसका  है !

                                                                                             (2017)

                                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: ऐतबार: विश्वास; बेवफ़ा: आस्थाहीन; इख़्तियार: अधिकार; राज़: रहस्य; ख़ुमार: तंद्रा, मद; रंजो-ग़म: खेद एवं शोक; बज़्म: सभा; मयार: स्थान; तिलिस्म: मायाजाल, रहस्य; साहिर: मायावी; हसीन: सुंदर; लम्हा: क्षण; राज़दार: रहस्य छुपाने वाला; इन्क़िलाब: क्रांति; आशिक़: उत्कट प्रेमी; बाग़ी: विद्रोही; इक़्तिदार: शासन, राज, सत्ता; ख़ाक: धूल; मज़ार: समाधि।  

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

होकर शहीदे-अम्न...

नाक़ाबिले-यक़ीं   है     अगर      दास्तां  मेरी
बेहतर  है  काट ले  तू   इसी  दम  ज़ुबां  मेरी

देखी  तेरी  दिल्ली    तेरी  सरकार   तेरा  दर
सुनता  नहीं  है  कोई   शिकायत   जहां  मेरी

सच  बोलना   गुनाह  हो   जिस  इक़्तेदार  में
नाराज़गी      ज़रूर     दर्ज  हो      वहां  मेरी

बढ़ता ही जा रहा  है बग़ावत  का  सिलसिला
देखें  कि  जा  रही  है  कहां  तक  अज़ां  मेरी

यूं  ही  नहीं  मैं  कूच:-ए-क़ातिल  में  आ  गया
हर  ज़ुल्म  के  ख़िलाफ़   लड़ी  है   ज़ुबां  मेरी

होकर  शहीदे-अम्न    मुझे    अज़्म  वो  मिला
हर  ज़र्र:    कर  रहा  है    कहानी  बयां  मेरी

जो  है      क़ुसूरवार     उसे  दे     ख़ुदा  सज़ा
मय्यत  बिगड़  रही  है   अगर   बे-मकां  मेरी  !

                                                                                                (2018)

                                                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: नाक़ाबिले-यक़ीं : अविश्वसनीय; दास्तां : गाथा, आख्यान; ज़ुबां : जिव्हा; इक़्तेदार: राज, सरकार; नाराज़गी : अप्रसन्नता, असहमति; दर्ज : अंकित; बग़ावत : विद्रोह; सिलसिला : क्रम; अज़ां : पुकार; कूच:-ए-क़ातिल : वधिक की गली; ज़ुल्म : अन्याय; शहीदे-अम्न : शांति की बलि; अज़्म : पहचान, प्रतिष्ठा; ज़र्र : कण; बयां : व्यक्त; क़ुसूरवार : दोषी, अपराधी; सज़ा : दंड; मय्यत : शव; बे-मकां : समाधि के बिना।

बुधवार, 24 जनवरी 2018

बाज़ को आस्मां...

हम  ख़ुदा  के  क़रीब  रहते  हैं
वां,  जहां  बदनसीब   रहते   हैं

बन  रही  है  वहां  स्मार्ट  सिटी
जिस जगह सब ग़रीब रहते  हैं

कर रहे हैं गुज़र  जहां पर हम
हर  मकां  में  रक़ीब  रहते  हैं

बाज़ को आस्मां  मिला  जबसे
ख़ौफ़  में   अंदलीब    रहते  हैं

शाह कुछ अहमियत नहीं  देते
किस वहम में  अदीब  रहते हैं

हम  परस्तारे-दिल  कहां  बैठें
दूर    हमसे   नजीब   रहते  हैं

ख़ुल्द   बीमारे-इश्क़  क्यूं  जाएं
क्या  वहां  पर  तबीब  रहते  हैं  ?!

                                                                 (2018)

                                                           -सुरेश  स्वप्निल   

शब्दार्थ: वां: वहां; बदनसीब: अभागे; बाज़: श्येन, एक शिकारी पक्षी; आस्मां: आकाश, सर्वोच्च स्थान; ख़ौफ़: आतंक, भय; अंदलीब: कोयलें; अहमियत: महत्व; वहम: भ्रम, संदेह; अदीब: साहित्यकार; परस्तारे-दिल: हृदय के पुजारी; नजीब: श्रेष्ठि जन, उच्च कुलीन; ख़ुल्द: स्वर्ग; तबीब: औषधि देने वाले, वैद्य।       

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

हाथ हमने जलाए...

आपको  शौक़  है  सताने  का
तो  हमें   मर्ज़  है  निभाने  का

सीख  लें  नौजवां  हुनर  हमसे
रूठती   उम्र  को   मनाने  का

इश्क़  भी  क्या  हसीं  तरीक़ा  है
दुश्मनों  को   क़रीब  लाने  का

शायरी  सिर्फ़  एक  ज़रिया  है
ज़ीस्त  के  रंजो-ग़म  भुलाने  का 

हाथ   हमने   जलाए   दानिश्ता
था  जहां  फ़र्ज़  घर  बचाने  का

शाह  की  फ़ौज  शाह  के  गुंडे
काम  है  बस्तियां   जलाने  का

आ  गया  वक़्त  ताजदारों  को
खैंच  कर  तख़्त  से  गिराने  का !

                                                                          (2018)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मर्ज़: रोग; हुनर: कौशल; इश्क़: उत्कट प्रेम; हसीं: सुंदर, मोहक; ज़ीस्त: जीवन; रंजो-ग़म: दुःख-दर्द; दानिश्ता: जान-बूझ कर; फ़र्ज़: कर्त्तव्य; फ़ौज: सेना; ताजदारों: सत्ताधारियों; तख़्त: आसन।  






सोमवार, 22 जनवरी 2018

तजुर्बाते-जम्हूर...

नई     आरज़ू  की     शुआएं  नई
गुलों  को   मिली  हैं    हवाएं  नई

अभी  दोस्तों  को  बुरा  मत  कहो
अभी    आ  रही  हैं     दुआएं  नई

न मुजरिम रहे  हम  न मुल्ज़िम हुए
लगाते  रहे       वो:       दफ़ाएं  नई

इधर  लोग       बेज़ार  हैं     आपसे
कहीं  और     रखिए     अदाएं  नई 

तजुर्बाते-जम्हूर  का          शुक्रिया
नहीं  चाहिए     अब     वफ़ाएं  नई

रग़ों  में  सिमटना    मुनासिब  नहीं
लहू      चाहता  है        ख़ताएं  नई

ख़ुदा की गली से  निकल आए हम
कि  जी    चाहता  है    ख़लाएं  नई  !

                                                                           (2018)

                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: आरज़ू: अभिलाषा; शुआएं; किरणें; गुलों: फूलों; दुआएं: शुभ कामनाएं; मुजरिम: आरोपी; मुल्ज़िम: अपराधी; दफ़ाएं: धाराएं; बेज़ार: तंग, परेशान; अदाएं: -भंगिमाएं; तजुर्बाते-जम्हूर: लोकतंत्र के अनुभव; वफ़ाएं: निष्ठाएं; रग़ों: शिराओं; मुनासिब: उचित; लहू: रक्त; ख़ताएं: अपराध, दोष, उपद्रव; ख़लाएं: एकांत ।  

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

ये: शौक़े-क़त्ल बुरा...

ये: एहतरामे-वफ़ा  है  कि  कम  नहीं  होता
अजीब  मर्ज़  लगा  है  कि  कम  नहीं  होता

इधर-उधर  के  कई  ग़म  उठा  लिए  सर  पर
मगर  ये:  बार  बड़ा  है  कि  कम  नहीं  होता

बिखर  रहा  है    मेरा  ज़ह्र    गर्म  झोंकों  से
बग़ावतों  का  नशा  है  कि  कम  नहीं  होता

तेरे  रसूख़  के   क़िस्से    कभी  नहीं  थमते
इधर  वो:  रंग  चढ़ा  है  कि  कम  नहीं  होता

कहां  कहां  से  लहू  रिस  गया  रिआया  का
फ़ुसूं-ए-शाह  नया  है  कि  कम  नहीं  होता

अभी  तो  दाग़  हज़ारों  जबीं  पे  उभरेंगे
ये:  शौक़े-क़त्ल  बुरा  है  कि  कम  नहीं  होता

तेरा  ग़ुरूरे-अना  है  कि  सर  से  ऊपर  है
मेरा  ये:   ख़ौफ़े-ख़ुदा  है  कि  कम  नहीं  होता !

                                                                                                  (2018)

                                                                                           -सुरेश  स्वप्निल 


शब्दार्थ: एहतरामे-वफ़ा : आस्था के प्रति सम्मान; अजीब : विचित्र; मर्ज़ : रोग; ग़म : शोक, दुःख; बार : बोझ, भार; ज़ह्र : विष; बग़ावतों : विद्रोहों; नशा : उन्माद; रसूख़ : प्रभाव; फ़ुसूं : जादू, मायाजाल; दाग़ : कलंक; जबीं : मस्तक; शौक़े-क़त्ल : हत्या की अभिरुचि; ग़ुरूरे-अना : अहंकार का गर्व;  ख़ौफ़े-ख़ुदा : ईश्वर का भय।







गुरुवार, 18 जनवरी 2018

दुश्मनों की कमी...

वफ़ा  में  ज़रा  सी  कमी  पड़  गई
हमें  दुश्मनों  की   कमी  पड़  गई

दरिंदे    गली  दर  गली    छा  गए
कि  इंसां की  भारी कमी  पड़ गई

चला  शाह   घर  लूटने   रिंद   का
ख़ज़ाने  में   थोड़ी  कमी  पड़  गई

कभी   ज़ब्त  की   इन्तेहा  हो  गई
कभी जोश की भी  कमी  पड़ गई

फ़रिश्ते   उठा  ले  गए   बज़्म  से
हमें  जब  तुम्हारी  कमी  पड़  गई

ख़ुदा  रोज़   हमको   बुलाता  रहा
मगर  वक़्त की ही  कमी  पड़ गई

अभी तो  जनाज़ा  उठा  तक  नहीं
अभी  से   हमारी   कमी  पड़  गई !

                                                                        (2018)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: वफ़ा : आस्था; दरिंदे : हिंसक प्राणी; रिंद : पियक्कड़; ख़ज़ाने : कोष; ज़ब्त : धैर्य; इंतेहा : अति; जोश : उत्साह; फ़रिश्ते : देवदूत; बज़्म : सभा; जनाज़ा : अर्थी।