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सोमवार, 10 जुलाई 2017

...फिर नमी होगी

मेरे  अल्फ़ाज़  मुझसे  रूठ  कर  कुछ  दूर  बैठे  हैं
कि  जैसे  वक़्त  के  हाथों  सनम  मजबूर  बैठे  हैं

करें  किससे  शिकायत  दोस्तों  की  बेनियाज़ी  की
वफ़ा  के  दफ़्तरों  में  भी  तन-ए-रंजूर  बैठे  हैं

किसी  दिन  फिर  नमी  होगी  निगाहों  में  मेह्रबां  की
दुआ  लेकर  दरे-मेहबूब  पर  मशकूर  बैठे  हैं

अजब  तस्वीर  है  इस  दौर  में  बाग़े-सियासत  की
इधर  अमरूद  कच्चे  हैं  उधर  लंगूर  बैठे  हैं

मदारी  मस्त  है  सरमाएदारों  से  गले  मिल  कर
नज़र  जाती  नहीं  उसकी  जिधर  मज़दूर  बैठे  हैं

हमारा  मर्तबा  छोड़ो  हमारा  सिलसिला  देखो
हमारे      चाहने  वाले       रहे-मंसूर     बैठे  हैं

उतर  आए  ज़मीं  पर  हम  ख़ुदा  को  छोड़  कर  जबसे
सितारे  आसमां  पर  आज  तक  बे-नूर  बैठे  हैं  !
 
                                                                                                (2017)

                                                                                          -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: अल्फ़ाज़: शब्द (बहु.); सनम: प्रिय; मजबूर: विवश; बेनियाज़ी: निर्मोह, निर्ममता; वफ़ा: आस्था; तन-ए-रंजूर: रोगी, अस्वस्थ शरीर वाले; नमी: गीलापन, संवेदना; मेह्रबां: कृपालु; दुआ: प्रार्थना; दरे-महबूब: प्रिय का द्वार; मशकूर: आभारी; तस्वीर: परिदृश्य; बाग़े-सियासत: राजनीति का उद्यान; मदारी: मायावी, मायाजाल फैलाने वाला; मस्त: मदोन्मत्त; सरमाएदारों: पूंजीपतियों; नज़र: दृष्टि; मज़दूर: श्रमिक; मर्तबा: सामाजिक स्थान, वर्ग; सिलसिला: वंशानुक्रम; रहे-मंसूर: हज़रत मंसूर अ.स. के मार्ग पर, बलिदान के मार्ग पर; ज़मीं: पृथ्वी, संसार; सितारे: नक्षत्र; आसमां: आकाश; बे-नूर: निराभ्र, प्रकाशहीन। 








शनिवार, 8 जुलाई 2017

एक उम्मीदे-शिफ़ा ...

चंद  अश्'आर  जो  सीने  में  दबा  रक्खे  हैं
कुछ  समझ-सोच  के  यारों  से  छुपा  रक्खे  हैं

एक  उम्मीदे-शिफ़ा  ये  है  कि  वो  आ  जाएं
इसलिए  मर्ज़  तबीबों  से  बचा  रक्खे  हैं

हो  अगर  दिल  में  शरारत  तो  बता  दें  हमको
वर्न:  हमने  भी  कई  दांव  लगा  रक्खे  हैं

वर्क़  दर  वर्क़  बयाज़ों  का   मुताला  कर  लें
किस  क़दर  आपने  एहसान  भुला  रक्खे  हैं

सब्र  रखने  की  वजह  हो  तो  ख़ुशी  से  रख  लें
आपने  यूं  भी  बहुत  तीर  चला  रक्खे  हैं

घर  हमारा  जो  जला  है  तो  समझ  लें  वो  भी
चश्मदीदों  ने  कई  राज़  बता  रक्खे  हैं

अर्श  जिस  रोज़  पुकारेगा  निकल  जाएंगे
क़र्ज़  कब  हमने  ज़माने  के  उठा  रक्खे  हैं ?

                                                                                        (2017)

                                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: चंद: कुछ; अश्'आर: शे'र (बहु.); उम्मीदे-शिफ़ा: रोग-मुक्ति/आरोग्य की आशा; तबीबों: उपचारकों, वैद्यों/हकीमों; वर्न:: अन्यथा; वर्क़ दर वर्क़: पृष्ठ प्रति पृष्ठ; बयाज़ों: दैनन्दिनियों; मुताला: पठन; एहसान: अनुग्रह; सब्र: धैर्य; चश्मदीदों: प्रत्यक्षदर्शी; राज़: रहस्य; अर्श: आकाश, ईश्वर; क़र्ज़: ऋण।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

रहम नहीं आता ...

आज  ख़ामोश  रहें  भी  तो  क्या
और  दिल  खोल  कर  कहें  भी  तो  क्या ?

आपको  तो  रहम  नहीं  आता
हम  अगर  दर्द  सहें  तो  भी  क्या

क़त्ल  करके  हुज़ूर  हंसते  हैं
भीड़  में  अश्क  बहें  भी  तो  क्या

ज़ुल्म  तारीख़  में  जगह  लेंगे
शाह  के  क़स्र  ढहें  भी  तो  क्या

मौत  हदिया  वसूल  कर  लेगी
क़ैद  में  ज़ीस्त  की  रहें  भी  तो  क्या  ?

                                                                              (2017)

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: रहम: दया; हुज़ूर: श्रीमान; अश्क: आंसू; ज़ुल्म: अत्याचार; क़स्र: महल; क़ैद: बंधन; ज़ीस्त: जीवन। 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

आशिक़ों की अमां...

न  दिल  चाहते  हैं  न  जां  चाहते  हैं
फ़क़त  आशिक़ों  की  अमां   चाहते  हैं

उड़ानों  पे  बंदिश  न  पहरा  सुरों  पर
परिंदे    खुला  आस्मां   चाहते  हैं

मुरीदे-शहंशाह  हद  से  गुज़र  कर
रिआया  के  दोनों  जहां  चाहते  हैं

क़फ़न  खेंच  कर  लाश  से  वो  हमारी
बदन  पर  वफ़ा  के  निशां  चाहते  हैं

उमीदे-रहम  आपसे  क्या  करें  हम
सितम  भीड़  के  दरमियां  चाहते  हैं

हमारे  लिए  गोश:-ए-दिल  बहुत  है
कहां  तख़्ते-हिन्दोस्तां  चाहते  हैं

ख़ुदा  मान  ले  शर्त्त  तो  चल  पड़ें  हम
कि  क़द  के  मुताबिक़  मकां  चाहते  हैं  !

                                                                          (2017)

                                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : जां: प्राण; फ़क़त: मात्र; आशिक़ों: प्रेमियों; अमां: सुरक्षा; बंदिश: प्रतिबंध; परिंदे: पक्षीगण; आस्मां: आकाश; मुरीदे-शहंशाह: शासक के प्रशंसक/भक्त जन; हद: सीमा; रिआया: नागरिक गण; दोनों जहां: दोनों लोक, इहलोक-परलोक; क़फ़न: शवावरण; बदन: शरीर; वफ़ा: आस्था; निशां: चिह्न; उमीदे-रहम: दया की आशा; सितम: अत्याचार; दरमियां: मध्य; गोश:-ए-दिल: हृदय का कोना; तख़्ते-हिन्दोस्तां: भारत का सिंहासन; शर्त्त: दांव; क़द: आकार; मुताबिक़: अनुसार; मकां: आवास, समाधि। 

गुरुवार, 29 जून 2017

रग़ों में ज़हर...

किधर  ढूंढिएगा  कहां  खो  गया
मियां  मान  लीजे  कि  दिल  तो  गया

उसे  तिश्नगी  ने  न  बख़्शा  कभी
अकेला  ख़राबात  में  जो  गया

गुलों  को  न  अब  कोई  इल्ज़ाम  दे
कि  मौसम  रग़ों  में  ज़हर  बो  गया

मदारी  बना  शाह  जिस  रोज़  से
हक़ीक़त  से  क़िस्सा  बड़ा   गया

लबे-चश्म  सैलाब  घुटता  रहा
मगर  दाग़  दिल  के  सभी  धो  गया

किसे  हौसला  दें  किसे  बद्दुआ
कि  क़ातिल  मेरी  क़ब्र  पर  रो  गया

शबे-वस्ल  का  ज़िक्र  मत  छेड़िए
रहे  जागते  हम  ख़ुदा  सो  गया  !

                                                                                         (2017)

                                                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तिश्नगी: सुधा; बख़्शा: छोड़ा; ख़राबात: मदिरालय; गुलों: फूलों; इल्ज़ाम: दोष, आरोप; रग़ों: शिराओं; मदारी: इंद्रजाल के खेल दिखाने वाला; हक़ीक़त: यथार्थ; क़िस्सा: आख्यान; लबे-चश्म: आंख की कोर पर; सैलाब: बाढ़; दाग़: कलंक; हौसला: सांत्वना; बद्दुआ: अशुभकामना; क़ातिल: हत्यारा; क़ब्र: समाधि; शबे-वस्ल: मिलन की निशा; ज़िक्र: उल्लेख। 
 


मंगलवार, 27 जून 2017

मौत को इश्क़...

जब  जहालत  गुनाह  करती  है
सल्तनत  वाह  वाह  करती  है

आइन-ए-मुल्क  में  बहुत  कुछ  है
क्या  सियासत  निबाह  करती  है

सल्तनत  चार  दिन  नहीं  चलती
जो  सितम  बेपनाह  करती  है

अस्लहे  वो:  असर  नहीं  करते
जो  वफ़ा  की  निगाह  करती  है

आशिक़ी  में  अना  कभी  दिल  को
तो  कभी  घर  तबाह  करती  है

ख़ुर्दबीं  है  नज़र  मुरीदों  की
ख़ाक  को  मेह्रो-माह  करती  है

मौत  को  इश्क़  हो  गया  हमसे
मुख़बिरों  से  सलाह  करती  है  !

                                                                      (2017)

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: जहालत: बुद्धिहीनता; सल्तनत: साम्राज्य; आइन-ए-मुल्क: देश का संविधान; सियासत: राजनीति; निबाह: निर्वाह; सितम: अत्याचार; बेपनाह: अत्यधिक, सीमाहीन; अस्लहे: अस्त्र-शस्त्र; वफ़ा: आस्था; अना: अहंकार; तबाह: ध्वस्त; ख़ुर्दबीं: सूक्ष्मदर्शी; नज़र: दृष्टि; मुरीदों: भक्तजन, प्रशंसक; ख़ाक: धूल; मेह्रो-माह: सूर्य और चंद्र; मुख़बिरों: समाचार देने वाले, गुप्तचर। 

सोमवार, 26 जून 2017

वफ़ा के सताए...

ईद  में  मुंह  छुपाए  फिरते  हैं
ग़म  गले  से  लगाए  फिरते  हैं

दुश्मनों  के  हिजाब  के  सदक़े
रोज़  नज़रें  चुराए   फिरते  हैं

दिलजले  हैं  बहार  के  आशिक़
तितलियों  को  उड़ाए  फिरते  हैं

कोई  उनको  पनाह  में  ले  ले
जो  वफ़ा  के  सताए  फिरते  हैं

टोपियां  हैं  गवाह  ज़ुल्मों  की
किस  तरह  सर  बचाए  फिरते  हैं

शुक्र  है  हम  अदीब  सीने  में
दर्दे-दुनिया   दबाए  फिरते  हैं

शाह  हैं  ऐश  हैं  रक़ीबों   के
और  हम  जां  जलाए  फिरते  हैं  !

                                                                     (2017) 

                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हिजाब: मुखावरण; सदक़े: बलिहारी; दिलजले: विदग्ध हृदय; आशिक़: प्रेमी; पनाह: शरण; वफ़ा: आस्था; गवाह: साक्षी; 
ज़ुल्मों: अत्याचारों; अदीब: रचनाकार, साहित्यकार; दर्दे-दुनिया: संसार भर की पीड़ा; ऐश: विलासिता; रक़ीबों: शत्रुओं; जां: प्राण, हृदय।